हर घड़ी नाम तेरा लेना इबादत है क्या?
दिल में नफरत हो तो सजदों की जरूरत है क्या?
झूठ को सच की तरह पेश जो तुम करते हो,
आज कल के ये नए दौर की आदत है क्या?
शहर जलता है तो जलने दो मगर कुर्सी हो,
क्या सियासत की यही एक हक़ीक़त है क्या?
हर तरफ शोर है तहज़ीब के मर जाने का,
आदमी के लिए ये अपनी मज़म्मत है क्या?
वक़्त की गर्द में गुम हो गए चेहरे कितने,
याद रखने की किसी को यहां फुरसत है क्या?
-शिल्पा जैन
