बनी हूँ वेदना से मैं ,
वही श्रृंगार है मेरा…!!
वहीं मेरा घराना है,
जहां अक्सर दुखी घेरा….!!
लजाती आँख जब मुझको
सुहाना देखती मंजर……
वहीं खुशियाँ दमन होती,
जहां वह रोकती खंजर….
दिखे आसूं नजर में तो,
लगा गम का वहां डेरा….!!
बनी हूँ वेदना…….!!
दिलों में राज करती हूं,
मगर गम ही तराना है…..
निभाना साथ जीवन मे,
लगा किस्सा पुराना है…..
कभी तो आह मिट जाए,
खुशी मिलती मगर फेरा…..!!
बनी हूँ वेदना………………!!
लगेगें हर बरस मेले,
कहेंगी आँख अपनी भी……
भुला दो गीत तुम विरही,
खुशी तो देख कहती भी……
चलो आहें भुलाकर के,
सजा ही लें नवल डेरा…..!!
बनी हूँ वेदना……..!!
-वंदना सिंह ‘त्वरित’
