बहुत दिन हो गया साथी,
बात किये और मिले
क्या तुम खुश हो!
या दर्द के लहरों में तुम भी डूब रहे हो
मुझे तो याद भी नहीं रहता अब
चाँद का निकलना और सूरज का ढलना
या कि हवाओं का शोर
और बिजली का चमकना
कल की ही बात है
जोर के आँधी तुफान आने से
बिजली अचानक चली गई
और मैं रसोई में अंधेरे में ही कुछ पकाती रही
छननमनन के बीच जब हाथों में जलन महसूस हुआ तब
अंधेरे का एहसास हुआ
उस घड़ी जले पर मरहम लगाने का ख्याल नहीं आया
याद आया तुम्हारे हाथों का स्पर्श और तुम्हारी बेशर्म ठिठोली
चैत का दिन आ गया है, नीम के पेड़ पर निंबोली
और आम के पेड़ पर आम भी
फूलों में अमलतास और पलाश चटख रंग लाया है
और धूप के हिस्से में जलन भी आया है
आजकल कुछ अजब गजब हो गई हूँ
मन बौराया रहता है
जग की उदासी को अपने दुपट्टे में खोइछा की तरह बांध ली हूँ
आसमान के कोने से धरती की आह सुन रही हूँ
बादलों के बीच नदियों के आँसू देख रही हूँ
पहाड़ों की तलहटी से किसी दिल को दरकता देख रही हूँ
ध्यान से सुनो साथी
कहीं चैता गाने की आवाज आ रही है
और मेरे मन का एक हिस्सा तड़प रहा है
बेहया के पौधों पर तितलियों का दल आया है
पपीता के पेड़ पर पपीहा भी
लोगों से सुनी हूँ, दोनों का आना शुभ है
सोच रही हूँ,
इस शुभ घड़ी को आँचल में बांध लूं
और नींबू मिर्ची से नजर उतार लूं
देखो न साथी
तुम्हारे लिए अपनी हथेली पर
खेत खलिहान, बाग बगीचा सब उगा लाई हूँ
दूर कहीं सुहाग के गीत गा रही हैं स्त्रियां
क्या मुझे सावन का इंतज़ार करना होगा?
-कात्यायनी सिंह
