एक स्त्री बीज होती है,
मिट्टी में समर्पित हो मिट जाती है,
ताकि फल-फूल पल्लवित-पुष्पित हों,
और एक नई नस्ल मुस्कुराती रहे।
वह सहती है अंधेरों की घुटन,
चुपके से अपनी हस्ती को खोती है,
खुद को अंश-अंश गलाकर वह,
किसी और के आंगन की खुशहाली बोती है।
जब लहकती है कोई हरी-भरी डाल,
लोग अक्सर फूलों की तारीफ करते हैं,
पर भूल जाते हैं उस गहरे मौन को,
जो जड़ बनकर सारे बोझ संभालते हैं।
वह कभी बेटी, कभी पत्नी, कभी मां बनकर,
अपनी ख्वाहिशों की आहुति दे जाती है,
संसार जिसे ‘कमजोरी’ समझता है,
वह उसी त्याग से ‘सृष्टि’ बन जाती है।
मिटना उसका अंत नहीं, उसका विस्तार है,
वह सिर्फ एक नाम नहीं, पूरा संसार है।
बीज बनकर जो खो गई धरा के सीने में,
वही तो इस उपवन के जीवन का आधार है।
-डॉ संगीता बिंदल
पूना महाराष्ट्र
