भावनाएं शब्दों की मोहताज नहीं होतीं…
जनमते ही बालक को,
छाती से लगा लेती है,
दोनों हथेलियों में जैसे,
ब्रह्मांड को पा लेती है।
भूखा हो बच्चा तो,
छातियां भर आती हैं,
बिना कहे ही मां,
बालक की भूख समझ जाती है।
माथे की लकीरों को,
वो बिना कहे पढ़ लेती है,
पत्नी सांत्वना का हाथ,
धीमे से कांधे पर रख देती है।
विदा होती है बेटी तो,
पिता की छाती फटती है,
और मां की अंखियां,
सावन सी बरसती हैं।
याद करती है दूर कहीं बिटिया,
तो यहां मां को हिचकी आती है,
रिश्तों की यह डोर,
बिन बोले ही सब कह जाती है।
एहसासों का आकाश अनंत है,
भावों के पंखों में
वो परवाज़ होती है,
सच ही कहा है…
भावनाएं शब्दों की
मोहताज नहीं होतीं।
-कीर्ति प्रदीप वर्मा
