सूरज की किरणों से, मात्र जो चमकता था,
उस तुच्छ काॅंच हेतु, हीरे को गॅंवा दिया।
अभी-अभी आया था जो, अभी-अभी छाया था जो,
छाॅंव नव देख वृक्ष, वट को कटा दिया।
साॅंस-साॅंस पोर-पोर, सौरभ जो भरता था,
जीवन से निज उस, पुष्प को हटा दिया।
पाते हैं आनन्द प्रेमी, अगन में जल जिस,
आग से तुमने उस, खुद को बचा लिया।।
-डॉ. पवन कुमार पाण्डे
असोसिएट प्रोफेसर
निजामाबाद तेलंगाना
