“स्वानुभूति”
मां कीआंचल में छुपना।
भाई बहन संग प्यार से रहना।
साथ में खाना और खेलना।
बहुत ही अहम स्वानुभूति।
दिलो-दिमाग दिलशाद रहते।
मस्त मलंग बचपन की बातें।
सकारात्मक सोच कदम बढ़ाते।
संयुक्त कुटुंब संयम सिखलाते।
प्यार-दुलार संग मां की डांट।
अद्वितीय था मेरा परिवार।
अनुशासित कर्तव्यबोध ज्ञान।
बनारस कुटुंब आज भी पहचान।
साहित्य-संगीत बना धरोहर।
सभी सदस्य एक साथ रहकर।
गंगा किनारे प्रह्लाद घाट रहते।
लिख दिये आज स्वानुभूति यादें।
-प्रेम सिंह काव्या
छत्तीसगढ़
