1.
सिंदूरी सांझ ने ओढ़ा, झील का आँचल लाल,
घाट पर बैठी मैं अकेली, संग में केवल ख्याल।
दूर जाती एक नाव, ले गई जाने क्या मेरा,
लौट कर आएगा क्या, जो गया है अबके साल।
2.
सूरज ढलकर कह गया, “अब तू खुद को संभाल”,
लहरें आकर छू गईं, मेरा भीगा हुआ रुमाल।
मैंने पूछा मौन से, “कब तक यूं तन्हा रहूँ?”,
वो हँसकर बोला, “जब तक मन न हो निहाल।”
3.
न कोई आहट, न कोई बात, बस पानी का शोर,
भीतर उमड़ा एक समंदर, आँखों में भरा था घोर।
मैंने खुद को ही पाया, इस डूबते सूरज के पास,
जब से छोड़ा जग का साथ, तब से अपना ही छोर।
-मंजू सरावगी मंजरी
रायपुर (छत्तीसगढ़)

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शानदार सृजन आदरणीया 👌