टर-टर-टर टर्राता मेंढक।
गीत बेसुरे गाता मेंढक।
जब-जब भी बारिश होती है,
उछल-उछल इठलाता मेंढक।
चाहे बाढ़ भयानक आए,
लेकिन डूब न पाता मेंढक।
जब भी लगती भूख उसे तो,
कीट-पतंगे खाता मेंढक।
जल हो चाहे या फिर थल हो,
दोनों में रह पाता मेंढक।
जब भी उसको सांप दिखे तो,
भाग वहाँ से जाता मेंढक।
पता न चलता कुछ गर्मी में,
खुद को कहाँ छुपाता मेंढक।
-भाऊराव महंत
