मेरा मन
कभी सागर जैसा
आत्मसात कर लेता है
उस तक आने वाली हर नदी को
मेरा मन
कभी पर्वत जैसा
जो अडिग रहता है
हर कठिनाई में
मेरा मन
कभी आसमां सा
जहां उड़ जाता है
पंख फैलाकर
मेरा मन
कभी उपवन सा
हर भाव के फूलों से सजा हुआ
मेरा मन
कभी धरा सा
सह जाता है चुपचाप हर आघात
मेरा मन
कभी सिर्फ मेरे जैसा
बस मेरा ही मीत
-अनुपमा शर्मा
रुड़की
