जब हर तरफ कोलाहल गुंजा
तब बेहतर लगा मौन हो जाना
पहले मैंने सोचा
कोई मेरे मन को समझे
कोई मेरे मन को छुए
पर जब मौन गहरे उतरा
तो समझ आया
मेरा मौन सिर्फ मेरा है
मेरा वजूद
मेरा आत्म संवाद
मेरे मन की आवाज
स्वयं को जानने का आगाज
मेरी शक्ति
मेरी अभिव्यक्ति
यह चुप से एकदम अलग है
यह मेरा कदम शांति की ओर
या शायद खुद की ओर………..
-अनुपमा शर्मा
रुड़की
