मेरा साहित्यिक परिचय

नमस्कार दोस्तों, मैं सोनम लड़ीवाला, जयपुर, राजस्थान से हूं। मैं अंग्रेजी एम.ए. की छात्रा रही हूं। लिखना न मेरी आदत थी, न शौक था, पर ईश्वर के आशीर्वाद से हिंदी और अंग्रेजी दोनों ही भाषाओं में अच्छी पकड़ रही। पहली रचना 12वीं कक्षा में लिखी थी। तबीयत कुछ नासाज़ थी, काफी लंबा समय कुछ करने को नहीं था। दिमाग में कुछ आया, लिख रही थी, पता नहीं क्या। लिखकर भूल गई। कुछ दिन बाद जब उसे पढ़ा, पंक्तियों को थोड़ा व्यवस्थित किया, शब्दों में फेर-बदल किया, मन ही मन खुशी हुई, जब तुकबंदी भी बैठ गई। लगा, मैंने कुछ तो अच्छा लिखा है। यह एक समय होकर रह गया। कुछ महीनों के भीतर फिर एक कविता तैयार थी। समस्या वही, लिखने के लिए कहा गया, पर बिना किसी मार्गदर्शन के। न कोई बताने वाला था, न समझाने वाला। एक बार वह कविता विद्यालय के सभागृह में प्रस्तुत की। स्कूल के डायरेक्टर सर ने बुलाकर पूछा, सराहा और लिखते रहने का आशीर्वाद दिया। अपने पिता-तुल्य डायरेक्टर सर के प्रोत्साहित करने पर लिखना जारी रखा।
समय बीतता गया। 2019 जुलाई में ट्रेन में प्रीति दीदी, कीर्ति दीदी से मेरी बहन की मुलाकात हुई। दीदी ने उनकी बातें सुनीं और मेरे बारे में बताया। उन्होंने अन्तरा शब्दशक्ति के व्हाट्सऐप ग्रुप से जुड़ने को कहा। वहाँ से आकर दीदी के कहने पर ग्रुप से बेमन से जुड़ी। दो महीनों तक बिना किसी रचना-प्रस्तुति के ग्रुप से जुड़ी रही। रचनाएं पढ़ती, पर अपनी रचना-प्रस्तुति की हिम्मत नहीं हुई। लॉकडाउन के समय अन्तरा शब्दशक्ति से पूरी तरह जुड़ी। काव्य-लेखन से अलग कुछ लिखना सीखा। एक ही विषय पर अलग-अलग भावों को व्यक्त करना सीखा। एक ही चित्र को अलग-अलग रूप में देखना सीखा। इससे जुड़ने के बाद लेखन ने रफ्तार पकड़ी। लिखना शौक से आदत बन गया, और गलत नहीं कहूंगी, यह आदत अब एक सकारात्मक व्यसन बन गया है। बिना लिखे चैन नहीं पड़ता।
उपलब्धियों में कुछ खास नहीं, बस एक मंच द्वारा आयोजित साप्ताहिक प्रतियोगिता में प्राप्त चंद उपाधियां हैं।
मेरी एक पुस्तक भावनाएं का प्रकाशन अन्तरा परिवार द्वारा ही हुआ।
साल 2026 में भावनाएं भाग-2 का प्रकाशन भी अन्तरा परिवार द्वारा ही हुआ।
एक त्रैमासिक पत्रिका अन्तरीप में मेरी लगभग 5 रचनाएं प्रकाशित हुईं।
आगामी योजना यही है — नए आएंगे, जाएंगे, पर अन्तरा, जिसने मेरी इस रुचि को इतना आगे बढ़ाया, वो कल था, आज है और कल भी रहेगा। अनुभव ऐसा है जैसे अंधे की लाठी। आज भी मेरे लिए वह उस माँ की तरह है, जिसने पहले कदम चलने में मेरी मदद की। अन्तरा का मेरे साथ होना मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि है।

-सोनम लड़ीवाला
जयपुर (राजस्थान)

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