घर के साहित्यिक वातावरण के कारण बचपन मे सबसे पहले लिखा ,सबसे प्रोत्साहन मिलने पर आगे लिखते रहे। बचपन में प्रकृति के प्रति लगाव होने से विषय भी उससे जुड़े रहे।उम्र बढ़ने के साथ-साथ आसपास के ,परिवार के माहौल को देखकर रचना बनने लगी और निरंतर विषय भी बदलते रहे।साहित्यकार कोमल और दयालु ह्रदय का होता है तभी वह हर कहीं उनको अपनी लेखनी में शामिल कर लेता है।
घर में लेखकों की किताबें , पत्रिकाएं आती रहती थीं। बालसाहित्य के साथ नंदन पराग चंदामामा वेताल कॉमिक्स खूब पढ़ा।
ग्यारह साल में एक डायरी लेकर लिखना शुरू किया तब लिखा – ‘सावन आया झूले पड़ें हैं पेड़ों की गोद सूनी नहीं पेड़ों की गोद में फूल पलें हैं।’ ये डायरी अभी भी सहेज कर रखी है।
कॉलेज में और शादी के बाद भी लिखते रहे । अपने संकोची स्वभाव, ससुराल की परिस्थिति और घर , बच्चों के कारण इन कविताओं को छपवाने का ख्याल नहीं आया,।शादी के सात आठ साल बाद 1992-93 में पिताजी थोड़ा सा करेक्शन करके था लोकल पेपर , जैसे समवेत शिखर आदि में रचनाएं भिजवा देते थे । 1998में पिताजी के रायपुर के परिचित कवि दैवी सिंह चौहान जी के ‘सुमनाजंली ‘ काव्य संग्रह में पिताजी और अन्य स्थापित कवियों के साथ पहली बार मेरी रचनाएं भीं शामिल थीं। 2002 में बड़ी बहन की सलाह पर हम दोनों ने साझा काव्य संग्रह छपवाने का विचार किया,उसका नाम -वेतवा और रेवा’ रखा।मेरी पहचान नहीं के बराबर थी और मैं संकोची,कम आत्मविश्वासी थी।बहनजी झांसी में एमबीएस डाक्टर थीं और सोशल भी थीं । उनके परिचय का दायरा बड़ा था तो इसलिए किताब को दीदी ने अपने परिचितों को दिखाया । इस किताब को बहुत प्रशंसा मिली। सभी ने इन रचनाओं को बहुत पसंद किया जिसके कारण मुझे भी पहचान मिली।उनकी एक कहानी की किताब आ चुकी थी पर मेरा यह नया अनुभव था। इसके बाद से रचनाएं भेजनें का सिलसिला चल पड़ा।
हम दोनों बहनें का साथ ही पत्रिकाओं में, काव्य संग्रह में रचनाएं भेजने का सिलसिला जारी रहा।बहनजी के माध्यम से साहित्यकारो़ से मेरा परिचय हुआ। कुछ ने अपने ग्रुप में जोड़ा। वहीं से 2015 में बीकानेर मैत्री सम्मेलन में जाने का अवसर मिला। वहां पर भी बहुत लोगों से परिचय हुआ , जिसमें प्रीति जी भी हैं।मैंने अपने को समझा , मेरी अपनी पहचान बनी है मातृभारती ई-बुक का पता नहीं चला, जिससे मैंने बहुत लिखा।
इसके बाद मेरी दो और किताबों,एकल काव्य संग्रह ‘धीरे धीरे रे मना ‘और बच्चों की किताब ‘खेल में सीखो’आयीं। 2016 से इसके बाद मैंने स्थानीय कार्यक्रमों में शामिल होना शुरू किया और किसी ग्रुप से जुड़ने का प्रयास किया । पिताजी और बहनों का बहुत सहयोग रहा।
बहनजी के साथ साझा संकलन छपने के बाद मेरी रचना ठाणे से महिला संकलन अभियान में रचना प्रकाशित हुई। इसके बाद दिल्ली के जेएमबी प्रकाशन से नारी चेतना के स्वर, एकता की मिसाल श्रेष्ठ काव्य माला भाग एक,दो, स्वर्ण जंयती पुस्तकों में रचनाएं प्रकाशित हुई। बड़ोदरा के काव्य संग्रह स्त्री -विमर्श–समकालीन कविता का नया आयाम में कविता।समाज कल्याण -दिल्ली,आगमन -हापुड, साहित्य समीर दस्तक- भोपाल,मासिक पत्रिका शाश्वत भारती -उज्जैन,विवेक वाणी-बडवाह खरगौन -आदि राष्ट्रीय पत्रिकाओं में कविताएँ एवं कहानी प्रकाशित 2019 मिली-भगत हास्य-व्यंग्य का वैश्वीकरण संकलन में 43 लेखकों में दो व्यंग रचना सम्मिलत ,फरवरी2020 को अमर उजाला की रुपायन पत्रिका में लघुकथा का प्रकाशन ,2021 रायपुर वैभव प्रकाशन से साझा लघुकथा संकलन हम बीस में शामिल 2022 धनक काव्य-संग्रह में तीन कविताएं प्रकाशित 2022 स्टोरी मंत्रा बाल कहानी साझा संकलन में चार कहानी चयनित और दो का ऑडियो एमेजाॅन,सावन एप पर उपलब्ध है जिसे सुना जा सकता है।जय-विजय ईबुक में बाल-कविताएँ और बाल-कहानी,ईबुक 2018 से मातृभारती की 6 प्रतियोगिताओं में टॉप टेन में स्थान और उनका प्रकाशन,48 बाइट्स 5फरवरी2020को मातृभारती ईबुक में ओस की बूंदें मुक्तक संग्रह का प्रकाशन। 2019 से प्रतिलिपि ईबुक , स्टोरी मिरर ईबुक में आठ कविताएँ,कहानियों का प्रकाशन ,2022 मार्च-अप्रैल में स्टोरी मंत्रा के साझा बाल -कहानी संग्रह में छपी कहानियों के लिए सर्टिफिकेट ।स्टोरी मिरर ईबुक की होने वाली प्रतियोगिताओं में निरंतर भागीदारी और उनसे प्राप्त सर्टिफिकेट । अभी 2026 में विश्व मैत्री छत्तीसगढ़ ईकाई के काव्य संकलन में प्रकाशित होने भेजीं हैं।
..पुष्पगंधा प्रकाशन कवर्धा के द्वारा काव्य सुमन सम्मान।म.प्र.नवलेखन संघ भोपाल द्वारा साहित्य मनीषी एवं भाषा भारती सम्मान।रूम टू रीड दिल्ली द्वारा राष्ट्रीय बाल लेखन प्रतियोगिता में तृतीय पुरस्कार हम सब साथ साथ नई दिल्ली द्वारा वरिष्ठ प्रतिभा सम्मान,पूर्वोतर हिंदी अकादमी शिलांग द्वारा डॉ महाराज कृष्ण जैन स्मृति सम्मान ।बीकानेर में चौथा सोशल मीडिया मैत्री सम्मेलन 4,5,6 ,2016 में प्रतिभा प्रदर्शन और प्रतिभा – सम्मान, 16फरवरी 2020को विश्व मैत्री सम्मेलन रायपुर में प्रतिभागिता के लिए प्रतीक – चिन्ह एवं प्रमाणपत्र प्राप्त हुआ। रायपुर की स्व मंजुला श्रीवास्तव जी काव्य गोष्ठी में आमंत्रित करतीं रहीं। अभी एक ग्रुप तो हर महीने जाना जारी है।रायपुर आकाशवाणी से कविताओं एवं कहानी का प्रसारणभी किया ।
मेरी साहित्यिक यात्रा की सफलता के लिए अपने बड़ों का आशीर्वाद, ईश्वरीय कृपा और जिन समूहों ने मुझे जोड़ा है उन सभी को बहुत धन्यवाद देखतीं हूं जिनके कारण आज मुझे सबसे पहचान मिली और मैं खुद को पहचान पायी।
-अमृता शुक्ला
