मैं मजबूत वृक्ष बरसों से खड़ा।
कितने आँधी-तूफानों से लड़ा।
सहनशीलता से सामना किया,
धराशाई करने का था दाँव बड़ा।
हमारे साथियों का कर सफाया,
लोभ से धरती को बंजर बनाया।
इससे ऋतुओं का समय बदला,
पर्यावरण को नुकसान पहुँचाया।
तभी खूब तेज ग्रीष्म रहा तपता,
बारिश का कहर हो तूफान चलता।
बाढ़ से होती तबाही साल दर साल,
ऐसे हालात में पानी जड़ों में भरता।
जमीन से जुड़ा हुआ हूँ अभी तक,
गिर गया पर टूटा नहीं हूँ अभी तक।
मैनें संभाल कर रखा हुआ खुद को,
हरियाली सृजन कर रखी अभी तक।
-डाॅ अमृता शुक्ला
