(मनहरण घनाक्षरी काव्य)
कितने लोग बदलें, बढ़ते गए फासलें।
हर जगह दुरियां, स्नेह मिटाती हुई।
रिश्ते भी हुए बेगाने, बन गए अफसाने।
बदली हुई नीतियां, स्नेह मिटाती हुई।
घर-संसार बिखरा, उजड़ गया बसेरा।
रिश्तों में खड़ी दीवारें, स्नेह मिटाती हुई।
आंगन चमन जैसा, पुरानी यादों का किस्सा।
लत पैसों की निराली, स्नेह मिटाती हुई।
बोझ बने माता-पिता, कौन है उन्हें देखता।
देखो उन्नति हमारी, स्नेह मिटाती हुई।
अपने भी हुए बैरी, लहू में डुबती छुरी।
मांगें प्राणों की आहुति, स्नेह मिटाती हुई।
टूटीं रिश्तों की कड़ियां, कैसी आयी है घड़ियां।
मन में छाई ख़ामोशी, स्नेह मिटाती हुई।
कितने लोग बदलें, हंसते हुए फासलें।
यही है नई दुनिया, स्नेह मिटाती हुई।
-प्रा.गायकवाड विलास
मिलिंद महाविद्यालय लातूर
