ये कैसी बेचैनी मुझमें
कोई इसको समझ न पाये
खुद से खुद को लड़ना है
हम इसको पहचान न पाये—
याद किसी की जब आती है
उसका साया मुझको डसता
यादों का विष फैले मन में
बेचैनी क्यों जान न पाये–
कोई शिव नहीं हैं हम
जो हलाहल पी पायें
उसको भी हम न निगलें
नीलकंठ बनकर जी जायें —
विष बेल फैली उर अन्तर
रूक-रूक कर विष फैलाये
सहते-सहते सहन न होये
खारा जल नयन बरसाये–
ये पीड़ा अब सहन न होती
कोई मेरो वैद्य बुलाये
आ के देखे कौन है विषधर
कैसे – कैसै मन ड़स जाये–
दन्त निशान कहीं न लागे
कोई घाव नजर न आये
फिर कैसे विष मन में फैले
तन-मन आकुल कर जाये–
ये कैसी बेचैनी मुझमें
कोई इसको समझ न पाये
खुद से खुद को लड़ना है
हम इसको पहचान न पाये–।
-इंजिनियर सी.बी.वर्मा
