रिश्तों में बढ़ती औपचारिकता का सच

कभी द्वार खटखटाने की आवश्यकता न थी। आत्मीयता इतनी प्रगाढ़ थी कि पगध्वनि सुनते ही मन के कपाट स्वयं खुल जाते थे। माँ का वात्सल्य यूँ छलक कह उठता, “आ गए बैठो, अब तो पूर्व-सूचना का अलिखित विधान है। “भ्राता, अवकाश में हो? क्षण-भर का सान्निध्य संभव होगा?”
सत्य तो यह है कि सम्बन्ध अब अतिथिवत् हो चले हैं। नियत अवधि, सीमित संवाद, और विदा के समय औपचारिक धन्यवाद। कभी मनमुटाव होता तो मनुहार के चार अध्याय रचे जाते थे। अब एक संकेत पर ही सेतु ढह जाते हैं, एक स्पर्श पर ही बंधन छिन्न भिन्न।
इस मायावी यंत्र ने दूरियों को समीप कर दिया, परन्तु हृदय के मध्य योजनों का अंतराल बढ़ गया। जन्म-दिवस पर आभासी पटल तो शुभकामनाओं से सज उठता है, पर आलिंगन का ऊष्म स्पर्श विस्मृत हो गया। सुख-दुःख अब आख्यायिका बनकर ‘कथा’ में प्रवाहित होते हैं, नेत्रों के दर्पण में प्रतिबिम्बित नहीं होते।
दोष किसी एक का नहीं। हम सब काल के रथ पर आरूढ़ हैं, निरंतर गतिमान। परन्तु क्षण-भर ठहर कर विचारो जिस दिवस यह यांत्रिक दीप बुझ जाएगा, उस तमस में कौन तुम्हारे समीप दीपक बनकर बैठेगा? औपचारिकता कार्य-क्षेत्र की शोभा है। गृह की चौखट पर तो वही धूसर, अनगढ़, लुंगी-बनियान वाले सम्बन्ध ही आत्मा को तृप्त करते हैं।
कभी अकस्मात् ही मित्र-द्वार पर दस्तक दे आओ। जननी को निष्प्रयोजन ही हृदय से लगा लो। अनुज से बिना हेतु के ही बतिया लो। विश्वास रखो, सम्बन्धों की मंजूषा से कृत्रिमता की तीक्ष्ण गंध तिरोहित हो जाएगी।
सम्बन्धों को सिंचित करना है तो थोड़ा अनियोजित, थोड़ा अक्रमबद्ध होना ही पड़ेगा। क्योंकि गणना-यंत्र से केवल अंक साधे जाते हैं, अनुराग नहीं।

-आनंद पाण्डेय “केवल”

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