कुंडलिया छंद
रोटी हो ईमान की, भले नमक के संग।
आनंदित सुख से भरें ,जीवन में रस रंग।।
जीवन में रस रंग, शांति मय उपवन होता।
ईश आस – विश्वास, धैर्य वह कभी न खोता।।
श्रम से भरता पेट, नहीं हो नीयत खोटी।
प्रतिपल स्वस्थ प्रसन्न, रखे कर्मों की रोटी।।
रोटी सबकी गोल है, ऊँची देख छलाँग।
जंग अमीरी से लड़े ,नित्य मजूरी बाँग।।
नित्य मजूरी बाँग, माँगता हक है अपना।
विवश नहीं मजदूर, सर्व सुख देखे सपना।
शोषक- श्रम- धन काट, माँगते रिश्वत मोटी।
खाते श्रमिक किसान, सदा ही श्रम की रोटी।।
रोटी कई प्रकार की,आड़ी – टेढ़ी गोल।
मोटे- बारिक अन्न से, मिले स्वाद अनमोल।।
मिले स्वाद अनमोल, सर्व रूपों में खाते।
संस्कृति भिन्न भूगोल, प्रीति से रीति चलाते।।
शहद मधुर नवनीत, दाल बाटी हो मोटी।
मोटा अंगाकार, सुपाचक मिलेट रोटी।।
-अमिता रवि दुबे
