लघुनाटिका
दृश्य – एक
लोकार्पण समारोह का समापन।
शाम का धुंधलका।
उत्साहित लेखकों का एक दल।
सबके हाथों में अपने प्रकाशित संग्रह की एक-एक प्रति, चेहरों पर स्वाभाविक मुस्कान।
प्रख्यात कवि, सोम माथुर जी को भेंट करते हुए।
फोटोग्राफर :- “स्माइल प्लीज…. वेरी गुड।”
पीछे से एक नवोदित कवि सीनियर फोटोग्राफर को छेड़ते हुए—
“सर, मैं हूँ या उड़ा दिया?”
“शर्मा नाम है, बच्चू। अपनी तीसरी आँख से आज तक कोई नहीं बच पाया। न संत्री, न मंत्री। समझे!”
“ये ले, देख! अपना क्लिक।”
“चल, निकाल 100/- का एक पत्ता।”
दृश्य – दो
रात दस बजे।
चैक आउट टाइम।
कवि सोम माथुर,
लिफाफे में रखे नोट ध्यान से गिनते हुए—
“स्याला,,,,, बात हुई थी बीस हजार की, पकड़ा दिए दस।”
“खाली-पीली दिमाग की बत्ती गुल करते हैं ये लोग। अगली बार ठोक-बजाकर तय करना पड़ेगा!”
घड़ी पर नजर डालते हुए—
“आई एम गेटिंग लेट।”
“हरीअप प्लीज!”
कवि सोम माथुर आगे-आगे।
वेटर : पीछे-पीछे।
वेटर :- “एक्सक्यूज मी, सर!”
“एक बंडल शायद, उसमें बुक्स हैं।”
सोम माथुर जी : “ओह!”
“लॉवी में रख दो, नेक्स्ट ट्रिप में कलेक्ट कर लेंगे।”
दृश्य – तीन
शयन-कक्ष में आराम फरमाते हुए।
कवि सोम माथुर।
मोबाइल की रिंग बजती है।
“ट्रिन-ट्रिन।”
“हेलो, आप कौन?”
“मैं खाख अंगारी।”
“सर, क्या गजब का वक्तव्य था उस दिन आपका।”
“रियली, वी आर वेरी इम्प्रेस्सेड विथ यू, सर।”
“सर, बहुत सारे पेपर्स ने फ्रंट पेज पर कव्हर किया है आपको। यू आर ग्रेट, सर।”
“सर, हम लोगों का वह ग्रुप फ़ोटो भी है, जिसमें आपको हम लोग बुक प्रेजेंट की थी, मीडिया ने!”
“रियली, सर, यू आर ग्रेट!”
दो सड़े दाँतों के पार्श्व में एक माचिस की , तीली घुसेड़कर कुरेदते हुए, मुग्ध मुद्रा में कवि सोम माथुर—
“य्यार, यह तो आप सब का प्रेम है। हम लोग तो किनारे के पेड़ हैं!”
नवोदित कवि , फोन पर जुग जुग जियो सर!
“लॉन्ग लिव, सर…… सर, सर…..मेरी बुक पढ़ी क्या!!!!!!!!!!”
कवि सोम माथुर, वायाँ हाथ चोटी पर फिराते हुए—
“हाँ! ज़नाब वह तो कल ही खत्म कर दी।” वो क्या है न! मेरी रीडिंग थोड़ी फास्ट है। दो-चार पेज और रह गए।”
“कल तक खत्म कर देंगे!”
नवोदित कवि,”सर कौन सी ? मैंने आपको दो पुस्तकें भेंट …..
सोम माथुर,
जल्दी से फोन काटने की चेष्टा करते हुए—
“हैलो, हैलो, हैलो, यहाँ थोड़ा नेटवर्क वीक है। कल बात करते हैं!”
पर्दा गिरता है।
(चित्र गूगल से साभार)
-मनोज जैन
