अचानक गायब हो गए बच्चे।
अंतिम बार देखे गए पाठशाला जाते,
कमीज पर स्याही गिराए,
टाटपट्टियाँ दबाए।
पहाड़े रटते,
नर्सरी राइम याद करते,
अंत्याक्षरी खेलते,
बालू के घरौंदे बनाते।
कुछ देर पहले ही देखे गए थे
लोरियाँ सुनते मां-दादी-नानी की गोद में।
लुकछिप हँसते तोतली जबान में।
मिठाइयों के लिए ललचाते,
झुंड के झुंड धींगामुश्ती करते।
आखिरी दफ़ा देखे गए
खेल के मैदानों में।
बिना जूतों के नन्हे पाँव समेत
धरती की धूल सिर पर डालते,
नई फसल के साथ उगते मुस्कुराते,
खिलखिलाते,
तालाब में डुबकियाँ लगाते,
चिड़ियों-सा पंख फड़फड़ाते।
सहसा उड़ गए बच्चे ।
अफवाह उड़ी,
आकाश-मार्ग से आई थी एक परी,
ले गई बस्ती के सारे बच्चों को
रंगीन जादुई बक्से में भर कर।
देखा तमाम लोगों ने
उन्होंने ने भी जिनके थे वे बच्चे।
सिर धुन रहे थे कि क्यों सुनाई थीं
इनको परीकथाएं ?
परी के चंगुल में सहजता से कैद हो गए
आँखें मिचमिचाते, तालियाँ बजाते बच्चे।
एकाएक खबर आई,
पाए गए पड़ोस के शहर के साइबर में
पिज्जा खाते, कोल्ड ड्रिंक पीते,
कंप्यूटर गेम खेलते बच्चे।
बस्ती के अभिभावक भागे उस तरफ,
जिस तरफ नहीं थे बच्चे
वहाँ हँसता मिला एक वयस्क बचपन।
-सूर्यकुमार पांडेय
