छण भंगुर वहम था
टूटा तो किनारा हो गया
अपने ही प्रेम मे उलझी सी मै
वो तो कब का पराया हो गया
चांद तारे तोड़ लाने का उनसे
न जाने किसने जिक्र कर दिया
हम तो जमीं पर ही रह गये
वो तो आसमां का सितारा हो गया
अल्फाज़ है बेशकीमती
और पैने भी दोस्तों
दिल में बड़े -बड़े
सुराख़ कर गया
इस पर भी कुछ तो
कसर रह गई बाकी
हम तो वही थे अब भी
वो तो मीलों चला गया
काफी है इतनी उल्फत
जिन्दगी बिताने के लिए
मरने का ख़्याल भी नही
कम्बख्त घर कर गया
-श्वेता राजू सोनेकर
वारासिवनी
