विशद वैभव का
हुआ दखो उजाला
आगई बाहर निकल कर
‘धार’ की है भोजशाला!
झेलकर आघात भी
दुर्दांत नर के
पाल रखी है धरा ने
यह विरासत जुगा करके
फट गया है स्वयं , देखो–
अब यहाँ का तिमिर जाला!
सुनो! जग में विज्ञ -जन के
थे हम ही, थे बनें नायक
आज भी हम हैं
सभी के ध्वजा बाहक
विश्व भर की थी यही
यह धार नगरी पाठशाला!
है अभी कायम बनी
आकृति सुंदर
ये सुघड़ स्तंभ,देवी- देवता
के चित्र अंदर
शिल्प है अद्भुत
कला का यह निराला!
हैं प्रतीक्षित
वाग्देवी आ विराजें
वीण की फिर रागमय
झंकार लाएं
मंत्र सुरभित कुंड में हो
हवन ज्वाला!
-उदय शंकर सिंह ‘उदय’
