प्राणवायु पर निर्भर हमारी आयु
यह सत्य कैसे मैं भूल जाऊं
वृक्षों से मिलती प्राणवायु
यह सत्य में कैसे भूल जाऊं
परोपकार का बदला मानव
क्यों उनका विनाश कर चुकाता
अपने हाथों पेड़ काटता
अपना विनाश खुद रचाता
संकट में अब जग के प्राण
प्राणवायु को तरसती अब सांस
काट दिए तुमने सब जंगल
तभी आया प्राणों को संकट
लग रहा लाशों का जमघट
अटकी सांसे मानव के घट घट
हां ! हां!तुम्ही ने किया विकास
किया जीवनदाता पर कुठाराघात
क्यों रो रहे हो देख मृत्यु का पाश
प्राणवायु दाता की पीड़ा समझते तुम काश
तोड़ता जब जब मानव अपनी सीमा
दिखलाती तब-तब प्रकृति विनाश लीला
-निरुपमा त्रिवेदी
इंदौर (म.प्र.)
