शाखाएँ थीं वटवृक्ष हमारी

स्नेह नहीं अब सम्बन्धों में,
मतलब बिना कोई न यार।
यन्त्र-तन्त्र-संयन्त्र दिलों में,
मरी भावना, न कोई प्यार॥

जीव जो मेरे काम के नहीं,
छिड़क रसायन मार रहे हैं।
ईश्वर-निर्मित सृष्टि-जगत को,
मानव यम-श्मशान कर रहे हैं॥

मानवी तन में दानवी विकार,
कितना बदल गया संसार।
परोपकारिता स्वार्थ-लाभ में,
कितना भी घिनौना व्यापार॥

शाखाएँ थीं वटवृक्ष हमारी,
देती थीं संस्कारों की छाँव।
उनमें भी यांत्रिकता आ गई,
सूने हो गए सभ्यता के ठाँव॥

-नील मणि पाण्डेय

एक उत्तर छोड़ें

अन्तरा शब्दशक्ति – हिन्दी साहित्य, प्रकाशन और रचनाकारों के सशक्तिकरण का राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय मंच।
संपर्क करें
antrashabdshakti @gmail.com
Call- 9009423393
WhatsApp-9009465259
antrashabtshakti.com

Copyright © 2026 Antra Shabd Shakti. All Rights Reserved. Powered by WebCoodee

0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x