पीठ पे बोरी
आस की डोरी
मिले मजूरी।
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भूखा उदर
रोग कहर
हुआ बेबस।
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घर चलाने
बच्चे पढ़ाने
श्रम बेचता।
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शीत हो घाम
नहीं विश्राम
स्वेद बहाता।
मजदूर का जीवन
श्रम
सारे दिन
तर-बतर देह
मजदूर जीवन
इतना।
००००
ढूँढना
नित्य काम
सुबह दोपहर शाम
मिलता नहीं
आराम।
००००
पोटली
लिए हाथ
सब्जी चटनी प्याज
रोटी खाता
मजदूर
००००
सपने
मुट्ठी भर
पैसे बहुत कम
उलझन सुलझे
कैसे?
००००
स्वप्न
अब यही
बच्चे जाएँ विद्यालय
करूँगा श्रम
अहर्निश।
– डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई
