मेरे हिसाब से तो अगर रामयुग को छोड़ दिया जाए, तो कहीं-न-कहीं हर युग में समाज किसी-न-किसी रूप में संवेदनहीन ही रहा है, थोड़ा-बहुत ही सही। हर युग में, चाहे रिश्तों में या मानवता में, कह नहीं सकते, लेकिन जब अति हुई तो उसका समाधान भी किया गया। भगवान विष्णु के हर अवतार के लिए कोई-न-कोई ऐसा कारण था, जिसके कारण उन्हें धरती पर अवतरित होना पड़ा, और ये संवेदनहीनता का ही स्वरूप था।
मत्स्य अवतार में वेदों की रक्षा, जब हयग्रीव (शंखासुर) नामक असुर ने निद्रावस्था में ब्रह्मा जी के मुख से निकल गए परमज्ञान को, जिसमें चारों वेद थे, जलमग्न पृथ्वी में नष्ट करने के उद्देश्य से चुराकर समुद्र में एक शंख में जाकर छिपा दिया। उसमें चारों वेद, और मनुष्य व जीव-जन्तुओं के बीजों को नष्ट करना था। असुर तो वैसे ही संवेदनहीन होते हैं, लेकिन खुद की सुरक्षा की भावना भी थी कि उसको कोई नहीं मार सके। तब भगवान को मत्स्य अवतार लेना पड़ा।
दूसरा अवतार कूर्म, जो समुद्र मंथन के समय लिया। यहाँ भी देवों की रक्षा और दानवों का संवेदनहीन होकर अमृत प्राप्ति की लालसा।
तीसरा वराह अवतार, जिससे हिरण्याक्ष से पृथ्वी की रक्षा करना।
चौथा हिरण्यकश्यपु, जो अपने बच्चे के लिए भी संवेदनहीन था। वह सिर्फ स्वयं को भगवान कहलवाना चाहता था, जिसके लिए उसने स्वयं के बेटे को तरह-तरह से मारने की युक्तियाँ अपनाईं, लेकिन सफल नहीं हुआ।
वामन अवतार राजा बलि के अहंकार को तोड़ने के लिए था, जो खुद को पृथ्वी पर सबसे शक्तिशाली मानता था, और बहुत बड़ा दानी भी। दो पग में पूरी पृथ्वी और तीसरा राजा बलि का सिर, क्योंकि वह वचनबद्ध था। पाताल पहुँचाकर उसका घमंड तोड़ा गया।
परशुराम अवतार, जो दुष्ट, हिंसक और अत्याचारी राजाओं से पृथ्वी को मुक्त कराकर ऋषिगणों की रक्षा और धर्म की स्थापना के लिए हुआ।
सातवाँ, राम अवतार और कृष्ण अवतार। दोनों में प्रेम, विश्वास, आदर, भाईचारा, त्याग, समर्पण, अधिकार, वचनपालन, आज्ञापालन, कर्तव्य, प्रजाहित, राजहित—सभी का समावेश है। लेकिन कुछ अपनों की ही संवेदनहीनता के कारण वनगमन, और द्रौपदी चीरहरण, फिर महाभारत, गीता ज्ञान और अंत में कुरुवंश का अंत। धर्म की लड़ाई थी, किंतु संवेदनहीनता तो इस युग में भी थी।
और अब अंत में कलयुग, जिसकी परिभाषा संवेदनहीनता पर आधारित है। स्वमहत्व, महत्वाकांक्षा, स्वार्थपूर्णता, सही को दुख, गलत को सुख, हमेशा सच्चाई की कसौटी और गलत की वाहवाही—यही तो कलयुग की असली परिभाषा है। ईश्वर भी यहाँ मौन है, क्योंकि पाप का घड़ा भरा नहीं है। इसलिए कलयुग को हर युग का मिला-जुला रूप कहा जा सकता है।
रावण, कंस, हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यपु का अनुपालन आज अपनाया जा रहा है। व्यवहार में उसका पालन किसी-न-किसी रूप में किया जा रहा है। राम और कृष्ण का अनुसरण शायद कुछ लोग कर रहे हैं, जिनकी वजह से धरती थमी हुई है।
भौतिकवाद का बोलबाला, नई तकनीकी सुविधाएँ, भावनाओं का ह्रास, स्वार्थ, अहंकार—ज्ञान सबको बराबर मिला, लेकिन संवेदनहीन होने के मुख्य कारण हैं कि वेदों और पुराणों से किसने क्या अपनाया। कुछ यहाँ पर राम भी हैं, जो वचनों से बंधे हैं। कृष्ण हैं, जो स्वयं सामने नहीं आ सकते। कोई कंस है, कोई दुशासन और दुर्योधन, तो कोई कर्ण, जो अपने मित्र से वचनबद्ध है और हर हाल में मित्रता निभाने को तत्पर है।
पांडवों की भी अपनी मजबूरियाँ हैं, जो स्वयं को लुटता देखने को मजबूर हैं। द्रोण और भीष्म भी होंगे जरूर यहाँ, लेकिन वे भी प्रतिज्ञाबद्ध हैं। सही-गलत करने वाले दोनों अपने हैं। धर्मसंगत क्या है, जानते हुए भी अंजान बने रहना कहाँ तक उचित है? यह संवेदनहीन होना नहीं, धर्मसंगत होने की मजबूरी है।
अब कौन किसके आचरण को अपनाकर जीवन की परिभाषा अपने लिए लिखकर जी रहा है, यह तो वक्त तय करता है। लेकिन आज वह सिर्फ अपने लिए जी रहा है, इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता। संवेदनहीनता की पराकाष्ठा ही कलयुग को परिभाषित करती है।
-किरण मोर
कटनी (म.प्र.)
