सच बोलती उम्र

आज मैंने उम्र से पूछ ही लिया —
ढलती जा रही हो इतनी जल्दी,
क्या चाहत है जल्द पूरी हो
समाप्त हो जाने की?
थोड़ा रुको,
जी लेने दो मुझे भी खुलकर,
हँस तो लेने दो मुझे दोस्तों से मिलकर।

उसने बड़ी मायूस हो,
कहा गहरी साँस लेकर
“क्यों रुकूँ?
क्या करोगी तुम ऐसी ज़िंदगी जीकर?

बचपन में अंधेरों से तुम्हें लगता था डर,
बड़ी होकर हवाला देती हो समाज का नाम लेकर,
बुढ़ापे में टालोगी — उम्र का तकाज़ा है — कहकर।

कब तुमने अपनी तमन्नाओं को बढ़ने दिया?
कब तुम हँसती हो खुलकर?
रोना तो सीखा नहीं,
दर्द बयाँ कर सकती नहीं,
मुस्कराहट के पीछे के आँसू
किसी को दिखा सकती नहीं।

कुछ उधेड़बुन-सी दिल में लिए,
जिम्मेदारियों के बोझ तले,
जिया है तुमने सिर्फ
औरों की ख़ुशी के लिए।

कब तुमने स्वयं को निहारा है आईने में —
जो नज़र आती तुम्हें अपनी चेहरे की झुर्रियाँ?
कब तुमने अपने लिए ख़्वाब देखे,
जो मिटा सकतीं तुम्हारे-मेरे बीच की दूरियाँ?”

बस बहुत हुआ —
अब मुझे जाना होगा,
तुम्हें तुम्हारी शख़्सियत से मिलवाना होगा।
अपने किए पर तुम न कभी शर्मिंदा होना,
क्योंकि,
मरकर भी पड़ेगा तुम्हें ज़िंदा रहना।
आते जाते रहेंगे जीवन में ये सुख दुःख
हृदय में उठती रहेंगी यूँही हुक
मेरी कहानी मेरे अनुभव हैं,
मेरी पहचान मेरी संवेदना है।
स्वानुभूति के इन रंगों से ही,
जीवन मेरी सुंदर साधना है।।

-रीति झा

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