अब तो इंसान को इंसान समझ लेना
माता पिता को भगवान समझ लेना
जिनके होने ये धरा भी मुस्काई हैं
हा बुजुर्गों को आसमान समझ लेना
जिनकी किलकारियों से घर मे रौनक हैं
हा वही बच्चों की मुस्कान समझ लेना
किसी मुफ़लिस के मददगार हो जाएं
इसी को अपना धरम ईमान समझ लेना
दिन है जितने भी खुशी से हम बिताएंगे
खुद को चंद रोज के मेहमान समझ लेना
-किशोर छिपेश्वर”सागर”
बालाघाट
