समय का अभाव या प्राथमिकताओं का संकट?

समय का अभाव तो है, लेकिन रिश्ते निभाने में। वह भी सिर्फ वे रिश्ते, जिनमें फर्ज है, जिम्मेदारी है और कर्तव्य हैं। और इसी के विरोधाभास से उत्पन्न होता है प्राथमिकताओं का संकट। विरोधाभास इसलिए, क्योंकि यहाँ एक पक्ष और भी है। वह यह कि जहाँ जिम्मेदारी, फर्ज और कर्तव्य हैं, वहीं से प्राथमिकताओं का जन्म होता है। यानी अपेक्षा और उपेक्षा। अर्थात जिनसे अपेक्षा, उन्हीं की उपेक्षा। यानी बिना जिम्मेदारी के अधिकार की प्राथमिकता। विरासत का अधिकार चाहिए, लेकिन कर्तव्य की इति श्री के साथ।
आज के परिवेश में प्राथमिकताओं के मायने बदल गए हैं। पहले प्राथमिकताएँ परिवार की होती थीं और परिवार को साथ लेकर चलने की होती थीं, लेकिन अब स्वयं की हैं। और यह बात कुछ हद तक सही भी है। पहले स्वयं को आर्थिक, मानसिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ एवं सुदृढ़ रखना आवश्यक है, क्योंकि फर्ज, जिम्मेदारी और कर्तव्य का निर्वहन तभी संभव है, जब व्यक्ति स्वयं सक्षम हो। तभी वह बिना किसी व्यवधान के अपने जीवन की समस्त आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए तन-मन से समर्पित हो सकता है।
लेकिन अब कर्तव्य, फर्ज और जिम्मेदारी के साथ-साथ प्राथमिकता के मायने भी बदल गए हैं। आज प्राथमिकता का अर्थ केवल स्वयं से जुड़े कार्यों तक सीमित होकर रह गया है। चाहे रिश्ता निभाना हो, जिम्मेदार बनना हो या कर्तव्यपरायण होना हो, सब एक सीमित दायरे में सिमट गए हैं। और यह सीमित दायरा भी केवल अपने छोटे से परिवार तक। आज अधिकांश लोग माता-पिता को भी इस दायरे में शामिल नहीं करते। परिवार का अर्थ केवल स्वयं, जीवनसाथी और बच्चे रह गया है। इसके अतिरिक्त सभी रिश्ते रिश्तेदार और व्यवहार की श्रेणी में रख दिए गए हैं।
जबकि पहले संयुक्त परिवारों का समय था। घर का प्रत्येक सदस्य एक-दूसरे की प्राथमिकता हुआ करता था, केवल स्वयं की नहीं। आज भी पिता अपने पत्नी और बच्चों के लिए त्याग करता है, लेकिन शेष परिवार की जिम्मेदारी को अपना दायित्व नहीं मानता। समय की माँग भी शायद यही है, लेकिन अत्यधिक व्यस्तता ने रिश्तों की संकीर्णता को भी चरम पर पहुँचा दिया है। आज किसी के पास किसी के लिए समय नहीं है।
सोशल मीडिया को ही जीवन की सर्वप्रथम और सबसे आवश्यक प्राथमिकता मान लिया गया है। परिणामस्वरूप रिश्ते धीरे-धीरे नगण्य होते जा रहे हैं। इस भेड़चाल से निकलकर एक बार फिर पुरातन मूल्यों का अवलोकन करना होगा और स्वयं से यह प्रश्न पूछना होगा कि हमने वास्तव में क्या खोया और क्या पाया?

किरण मोर
कटनी (म.प्र.)

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