माँ की साड़ियाँ
सदा रहीं आकर्षण का केंद्र
जातीं थीं जब वे कहीं
निकाल कर पहन लेती
जो मन भाती थी
आज का समय होता
तो मोबाइल भी रहता
सेल्फियाँ खिंचती
पर तब तो
चिट्ठियों का सुनहरा
समय था,
उस समय मन की आँखों से
खिंचे चित्र मानो आज भी सजीव हैं
साड़ी पहने-लपेटे हुए मैं
और डाँटती हुई माँ
सारी तह/प्रेस बिगाड़ कर रख दी,
अब डाँटने वाली माँ नहीं
पर साड़ियाँ हैं अलमारी में
रखी हुई आज भी
उन्हें छू कर उनके स्पर्श को
अनुभव करती हूँ
उनसे जुड़ी घटनाएँ
स्मृतियों में कौंधती रहती हैं
जो वो बड़े मन से बताती थीं
ये तुम्हारी नानी ने और
ये तुम्हारे मामा ने और
ये जो प्यारे से मनभाते रंग वाली
तुम्हारे पापा ने परिणय वार्षिकी पर
लाकर दी थी और ये नारंगी वाली
कच्छ से लेकर आये थे
जब साहित्यिक समारोह में गए थे,
माँ जाकर भी नहीं जा पाती
वह सदा रहती है
अपने किस्से-कहानियों में
अपनी साड़ियों में
जिन्हें कभी उनकी बेटी
पहनती है/ स्पर्श करती है
सहलाती है/दुलराती है।
-डॉ. भारती वर्मा बौड़ाई
