चित्र आधारित सृजन
खूब पढ़ाई करके डॉक्टर बनना था उद्देश्य मेरा।
निस्वार्थ भाव से सेवा करने का था केवल ध्येय मेरा।
किंतु गृहस्थी की चक्की में, सारे सपने स्वाहा हो गए।
सबके सपने पूरे करते, मेरे सपन अधूरे रह गए।
सारा दिन रसोई में खटते खटते जीवन बीता जाता ।
तरह-तरह के व्यंजन और अचार बनाने में लग जाता।
चटखारे लेकर सब खाते,
मैंने खाया या नहीं खाया इसका कोई होश नहीं है?
या मैं भी थक जाती हूँगी, इसका कोई ध्यान नहीं है?
मेरी सारी इच्छाएं इस मर्तबान में सिसक रही हैं
घर की खुशियों पर मेरी सारी इच्छाएं भेंट चढ़ी हैं।
अपने सपनों को तिलांजलि दी, सबके हित फर्ज निभाने,
क्या उनका भी फर्ज नहीं है, मेरी चाहत को पहचानें?
मेरे भी कुछ सपने होंगे, उन सपनों की कीमत जानें।
मैंने सारे फर्ज निबाहे,वो भी मेरी चाहत जानें।
किंतु पति ही जान न पाया, किसको अपनी पीर सुनाऊँ।
डॉक्टर बनना चाहती हूँ, कैसे उसको पूरा कर पाऊँ।
घर में सभी यही चाहते हैं मैं घर के प्रति रहूँ समर्पित।
उनके इच्छाओं की खातिर, सारी खुशियाँ कर दीं अर्पित।
मेरी सारी इच्छाएं इस मर्तबान में सिसक रही हैं
सबको खुश करने के लिए, मेरी इच्छाएं भेंट चढ़ी हैं।
-राधा गोयल
