जब से मिला तेरे प्यार का आगोश,
मैं निखरती चली गई।
कलियों पर गिरती पहली ओस की भांति,
मैं रंगों में बिखरती चली गई।
सुर्ख होती गई मेरी चाहतों की रंगत,
सुर्खियों में ही अब मैं सजती हूँ।
रंग गई हूँ तेरे अहसासों के रंग में कुछ ऐसे,
कि अब मैं, मैं नहीं… तेरी परछाईं लगती हूँ।
चाँद की चाँदनी भी अब फीकी लगती,
मैं चांद की दूधिया धवल चाँदनी सी निखरती गई।
डूबती चली गई तेरे सागर सी आँखों की गहराई में,
लहरों के साथ मैं और भी सँवरती गई।
तुम्हारे प्यार का वो गहरा लाल रंग,
मेरी रूह में इबादत बन कर उतर गया।
जोड़ा जो मैंने सुर्ख रंग से अपनी वफ़ा का रंग,
तो मेरे ख्वाबों का हर लम्हा निखरता गया।
तुमने भर दिया उन अधूरे ख्वाबों को,
चाँद-सितारों के उस अनंत आसमाँ से।
अब ये सुर्ख गुलाब कभी न मुरझाएगा,
क्योंकि इसे जीवन मिला तेरे प्यार के रंगीनियों से।
-सरिता मिश्रा
नैरोबी केन्या
