सोचता हूं मैं अक्सर
कि बन जाता है कैसे कोई इंसान उस धरती पर अजनबी
जिसे सींचा था कभी अपने हाथों से उसने
जब लोग महत्वाकांक्षी और चालाक
कर देते हैं इनकार पढ़ने से उसके माथा और शिकन पर लिखी तारीख़ !
सोचता हूं मैं अक्सर
कि दफना देते हैं कितनीे आसानी से वे
संघर्षों के बीते दिनों को
वे गीत जो कभी करते थे उन्हें उतने उल्लसित
नहीं भाते अब जरा भी उनके कानों को
है यह कैसा परिवर्तन!
सोचता हूं मैं अक्सर
कि क्या है मुमकिन कभी
उन दिनों की यादों को कत्ल करना जब सूरज की रोशनी
करती थी रोशन हमारी उन रास्तों को जो डूब चुके हैं अब रात के अंधेरे में
जब चला करते थे हम साथ- साथ!
सोचता हूं मैं अक्सर
कि एकता और भाईचारा के वे आदर्श जिन्हें रखते थे संजोकर हम कभी
हो गए हैं इन वर्षों में लुप्त कैसे
भौतिकवाद के बढ़ते प्रभाव के साथ!
सोचता हूं मैं अक्सर
कि इंसान का दिल,जो बनाया गया था इतना कोमल
क्यों हो जाता है इतना संकीर्ण,हर मानवीय चेतना से रहित
कि बन जाता है वह जानवर जैसा-विनाश का कारक!
सोचता हूं मैं अक्सर
कि टूट गई है कैसे मानव-जाति की संपूर्णता स्वार्थी व्यक्तियों के नफ़रत के दबाव में
और कर दिया है वंचित हमें हर मौसम में प्रेम, रचनात्मकता और खुशी से!
सोचता हूं मैं अक्सर
कि बना देती है कैसे सत्ता किसी व्यक्ति को जंगली और क्रूर
करने लगता है कैसे वह न्याय का तिरस्कार और खो बैठता है अपना प्रत्येक मानवीय गुण
जबकि है मौत ही तो मनुष्य का अंतिम गंतव्य स्थान!
-डॉ प्रभात कुमार
