खुद के अस्तित्व की तलाश में
ढूँढती हूँ खुद को
कभी दूसरों की इजाजत में
कभी घर की इबादत में
कभी धूप में, कभी छाँव में
ढूँढती हूँ, घर के हर कोने में
अस्तित्व अपना !
तलाश करती हूँ, खुद को
कभी खुली आँखों के ख्वाबों में
धधकते मन की ज्वाला में
कोरे शब्दों के जाल में
भावनाओं के उलझन में
अठखेलियां खेलती मिलती हैं अस्तित्व मेरा
कभी आईनों से सवालों में,
कभी अपनों के टकरावों में,
कभी दुनिया की कसौटी पर,
कभी अपने ही ठहरावों में,
ढूँढती हूँ रंग अपने होने के,
सपनों और संघर्षों के कोने में,
जन्म लेता है फिर से अस्तित्व मेरा।
-दिशा मिश्रा
भोपाल (म.प्र.)
