प्रेम विवाह करके आई नई बहू धीरे धीरे खाना बनाना सीख रही थी ।
नए बने ससुर तो काफ़ी मीनमेख निकलाते थे , पर नई सास सब कुछ प्रेम से और बिना कोई टोकाटाकी करे खा लेती थी और चुपचाप सुधार करवा दिया करती थी ।
एक दिन एकांत में बेटे ने पूछा – माँ , पापा तो गौरा के हाथ से बने खाने पर कुछ ना कुछ टिप्पणी करते रहते हैं पर तुम कभी कुछ नहीं कहतीं , क्यों?
बेटा , मुझे पता है कि खाना कितने परिश्रम, समर्पण और लगन से बनाया जाता है और गौरा कोशिश कर रही है ना खाना बनाना सीखने में , ऐसे में मेरी तरफ़ से भी यदि कमियाँ निकलेंगी तो सुधार कैसे होंगे ।बेहतर बनाने के लिए कई बार उपाय बताने होते हैं कि कैसे बेहतर बना सकें ना कि कमी निकालना काफ़ी होता है । जब मैं नई बहू थी तो तुम्हारी दादी को मेरे बनाए खाने से शिकायतें होती थीं पर तुम्हारे दादा जी मेरा पूरा सहयोग करते थे । अब सहयोग या बुराई करने का मेरा मौक़ा है , मैंने सहयोग करना चुना ,वैसे भी कितने लोगों की मेहनत लगी होती है उसमें , ऐसे में मैं तो ईश्वर को धन्यवाद देती हूँ कि उन्होंने हमें भोजन दिया , बस यही बात मेरे लिए सबसे महत्वपूर्ण होती है बाक़ी बातें गौण – माँ सब कह कर पूर्ण संतुष्टि से मुस्कुराई तो पूरे घर में स्नेह की ख़ुशबू फैल गई।
-रेनू अग्रवाल
