“स्वानुभूती”
स्वयं से स्वयं का मिलन हो रहा है
क्या पाया क्या खोया आंकलन हो रहा है ।
उम्र का बड़ा हिस्सा बीत चुका है
वक्त कहाँ कभी कहीं रुका है
सोच सोच कर मैं हैरान हो रही हूँ
मैं क्या थी कभी और अब क्या हो गई हूँ ।
वो बेफिकरी वो अल्हड़पन ना जाने कहाँ खो गया है ।
वो जिद वो जुनून भी खो गया है ।
सारे शौक भी न जाने कहाँ पीछे छूटे
लगता यही कोई मुझसे न रूठे ।
रिश्ते नाते सारे सारी दुनिया दारी निभाई ।
मैं खूद को ही भूली सोच कर मुस्कुराई ।
आज लम्बे अरसे बाद जब खुद से मिली हूँ
खुश हूँ जो भी हूँ जैसी हूँ सबके दिल में बसी हूँ ।
अब मैं,,मैं ही अकेली नहीं हूँ ।
ले कर बैठी थी हाथ में गरम चाय की प्याली ।
चल रही थी मंद मंद हवा ठंडी ठंडी मतवाली।
कर रही थी बातें मैं खुद से खुद की हौले हौले।
कुछ तारीफों के कुछ शिकायतों के पिटारे थे खोले।
ये अनूभूती थी बहुत ही अदभुद अनूठी।
मैं हूँ अब भी मैं ही बस यही बात सच है।
बाकी दुनिया की सारी कहानी है झूठी।
समय और उम्र के साथ सब कुछ बदलता।
नाम पद बदलते हर रिश्ता बदलता
बदले परिवेश में बदलती रहती हैं जिम्मेदारी।
हम हम ही रहते हैं बशर्ते खुद से तोड़े न यारी ।
कितनी सुखद सलोनी थी ये मुलाकात आज की ।
मन भर कर आज हमने आपस में बात की ।
जल्द ही फिर मिलेंगे ये वादा दिया ।
लौटी वर्तमान में बंद यादों का पिटारा किया ।
-स्मृति गुप्ता
जबलपुर
