स्वानुभूति नींद में

“स्वानुभूति”

अपनी अनुभूतियों के पल दर पलसे
गुजरते हुए
दुनिया की नजरों से बचाकर
सपनों की कोमल सेज पर
कभी कभी ,
अपनी उम्मीदों के साफ कैनवास पर
आंकना चाहती हूं अनुकृति तुम्हारी
लिखना चाहती हूं एक कविता नींद में।

सूनी दोपहरी में,या दिन ढले ,आंधी रात को
गढना चाहती हूं एक सूरज
जिसकी किरणें, सिर्फ मुझे छुएं
या मेरे कोमल मन को
करना चाहती हूं, सिर्फ तुम्हारी बातें,,
नींद में।

या दूर कहीं सूनी डगर पर
साथ चलते चलते
पर्वतो के आर-पार,झूमती हवाओं के संग
गुनगुनाना चाहती हूं
मुसकराना चाहती हूं नींद में।

जानती हूं, आंख खुलते ही
बदल जाएगी मेरी खुशियों की दुनिया
बदलेगे सारे अहसास जिंदगी के
इसलिए समेट लेना चाहती हूं
अपने आंचल में सपनों की सौगातें
खो जाना चाहती हूं
नींद में।..

-पद्मा मिश्रा
जमशेदपुर

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