अंतर्मन की बात

तुझे कैसे सुनाऊं हाले दिल, मेरे अंतर्मन की बात
बारिश की बूंदों सा रिश्ता है ये तेरा मेरा
जितना हाथों में रखना चाहूं ये उतना ही गायब हो जाए
छूना चाहूं जो तेरी पलकों को, आँखें उतनी ही दूर नजर आए
साथ होते हुए भी एक तन्हाई सी है
ना मैं कुछ कह पाऊं, ना तू कुछ समझ पाए
कितनी बातें है जो करनी है तुझसे, बस मन में रह जाती है
काश, तू कभी तो मुझे सुन पाए
एक दर्द सा है इस कश्मकश में,की जितना इसे भूलूं उतना बढ़े
रात को थक हार कर जब जाता हूं घर की ओर
तो मिलते हैं आसमान की चादर ओढ़े
जमीन की गोद में लेटे हुए कुछ कहे अनकहे किस्से
जिनकी फटी एड़ियां और पानीयाई आँखें करती हैं बयां
उनकी आप बीती,नही उनका अनुभव
वहीं थोड़ी दूर मेट्रो की सीढ़ियों के नीचे बैठा है
नौ दस साल का भाविष्य ओढ़े किसी की उतरन
दो पल ठहर कर सोचता हूं,क्या नहीं आती इन्हें
पास के कूड़े की बदबू,क्या नहीं खाती रात की सर्दी इन्हें
क्या नहीं लगता इन्हें, डर फूथपाठ पर सोने का
ये सवाल चले आते हैं मेरे अंदर दस्तक देते
तुझे कैसे सुनाऊं हाले दिल मेरे अंतर्मन की बात

-एम. डी यस रामालक्ष्मी

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