ये रातें… ये हवाएँ… मोगरा और आधा चाँद…
अभी रात के साढ़े आठ बज रहा है।
दिन भर की भागदौड़, जिम्मेदारियों और अनगिनत विचारों से भरे मन को जैसे इस रात ने अपने आँचल में सुस्ताने के लिये बुला ली हो…. हवाएँ धीरे-धीरे बह रही हैं और ऐसा लग रहा है मानो उन्होंने बादलों को दूर तक खदेड़ दिया हो। आसमान कहीं-कहीं तो बिल्कुल साफ़ है, तो कहीं बादलों के छोटे-छोटे टुकड़े अपनी अनगढ़ आकृति गढ़ रहे हैं। बचपन में हम इन बादलों में न जाने कितने चेहरे, पक्षी, पहाड़ और न जाने कितनी आकृतियाँ खोजते थे। आज भी उन बादलों को देखकर मन कुछ-कुछ वैसा ही हो रहा है,सच ही कहते हैं लोग कि उम्र बढ़ जाती है, पर भीतर का बच्चा शायद कभी बड़ा होता ही नहीं है।
आज मन बादलों में वही भूली आकृति खोज रहा है…. और दिखता है,बादलों के बीच आधा चाँद है। जिसे देखकर मन में ख़्याल आता है कि सुंदरता तो पूर्णता में है ही नहीं, किसी का अधूरा होना ही हमें उसके और पास ले आता है। यह आधा चाँद,आज मन के खालीपन को भर रहा है।
ये आधा होना भी कितना खूबसूरत होता है न!
मुझे भी अच्छा लगता है,अपनी बात को आधे में छोड़ना….कि हर अधूरी बात अधूरी नहीं रहती
बाबू मोशाय….यह तो कुछ कुछ ऐसा है-
जैसे किसी प्रियजन की कही अधूरी बात, कोई अधूरा पत्र, या कोई अधूरा सपना जो आज भी स्मृतियों में अपनी जगह बनाए हुए है।
मैं आँगन में प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठी चाँद को देखती रही हूँ…. लग रहा है कि चाँद केवल आसमान में नहीं है, वह मेरे भीतर बहुत पहले से मौजूद था,वह मेरी यादों में, मेरी प्रतीक्षाओं में,कभी-कभी मेरी उदासियों में तो कभी मेरी खुशियों में और कभी इसी चाँद में मैं ढूंढती हूँ अपने पिता के चेहरे को….उफ्फ्फ कितना कुछ है इस चांद के पास मेरा….
कितनी पीढ़ियां इस चाँद को देखती आई हैं। कितनी आँखों ने इससे बातें की होंगी। कितने प्रेम, कितनी विरह कथाएँ और न जाने कितनी प्रार्थनाएँ उसकी चाँदनी में बहकर अनंत में विलीन हो गई होंगी,है न!
मैं,इन्हीं विचारों में डूबी थी कि तभी आँगन में खिले मोगरे की भीनी-भीनी खुशबू ने मेरा ध्यान अपनी ओर खींचा, हवा का एक झोंका आया और अपने साथ वह महक भी ले आया, जो सीधे मन तक पहुँची । कुछ खुशबुएँ केवल महकती नहीं, स्मृतियों के दरवाज़े भी खोल देती हो जैसे।
मोगरे की महक मुझे हमेशा घर की याद दिलाती है। उन गर्मियों की शामों की, जब आँगन में चारपाइयाँ बिछा करती थीं। माँ तुलसी पर दीपक जलाती थीं और रात धीरे-धीरे उतरती थी हमारे बड़े से आँगन में,अम्मा थाली में पानी भरकर रखती थी और कहती-चाँद उतरेगा…. तब जीवन इतना जटिल नहीं था। खुशियाँ छोटी ही सही पर सच्ची थीं। दुख आते भी थे, तो अपने साथ अपनापन लेकर आते, साथ था इसलिए सब अच्छा था। आज सब बदल गया है,हम भी समय भी, लोग भी और जीवन की गति भी। पर कुछ चीज़ें अब भी वैसी ही हैं… जैसे चाँद, हवाएँ और मोगरा….
सोचती हूँ प्रकृति कितनी उदार है। वह हर दिन हमारे लिए कुछ न कुछ रचती है, पर हम ही अक्सर उसे देखने का समय नहीं निकाल पाते। सूरज रोज निकलता , शाम रोज ढलती , फूल खिलते हैं, पत्ते झरते हैं, चाँद निकलता है… और हम अपने-अपने जीवन में इतने उलझे रहते हैं कि इन छोटे-छोटे जादू को देख ही नहीं पाते।
आज इस शांत रात में बैठकर महसूस हो रहा है कि जीवन का सौंदर्य किसी बड़ी उपलब्धि ,किसी बड़ी जीत या किसी बड़े उत्सव में ही नहीं छिपा होता। वह तो बस ऐसे ही छोटे-छोटे क्षणों में होता है,जब हवाएँ धीरे-धीरे बह रही हों, जब आधा चाँद अपनी अधूरी रोशनी से चमक रहा हो, जब मोगरे की खुशबू चुपचाप मन को छू रही हो और जब मन को कहीं पहुँचने की जल्दी नहीं, बस इस पल में ठहर जाने की इच्छा हो….
शायद सुख का वास्तविक अर्थ ही यही है,कुछ देर के लिए समय को पकड़ लेना, साँसों को धीमा कर लेना और उस खूबसूरती को महसूस करना जो हर दिन हमारे आसपास उपस्थित रहता है….
और इस समय, इस रात, इस हवा, इस चाँद और मोगरे की खुशबू के बीच बैठी मैं बस इतना ही सोच रही हूँ…..
ईश्वर ने दुनिया को सुंदर बनाने में कहीं कोई कमी नहीं छोड़ी , कमी तो शायद हमने ही कर दी, जो उसे देखने की फुर्सत हमारे पास नहीं….
शेष सब कुशल-मंगल है..!
-प्रतिभा श्रीवास्तव ‘अंश’
