(यात्रा वृतांत)☺️
किसी काम से बेटी से मिलने भोपाल जाना हुआ।साथ में छोटा बेटा प्रिंस भी साथ था।आरक्षित टिकिट न हो पाने के कारण यात्रा सामान्य डिब्बे में करनी पड़ी।
अब प्रारम्भ होता है यात्रा विवरण-गाड़ी डिब्बा ज्यादा तो नहीं भरा था परंतु लोग जगह घेर कर ऐसे बैठे थे कि वो उनकी ही जगह हो ।लोगो को बैठने ही नहीं दे रहे थे।
मेरे सामने वाली सीट पर एक भोपाली जी बैठे थे ।बार -बार उनके मुँह से -“मियाँ मैं यूँ के रिया हूँ”तकिया कलाम दोहराया जा रहा था।मुँह में पान, होठों पर उसकी लालिमा और चेहरे पर सफेद दाढ़ी, उनके तेज को बढ़ा रही रही।
कुछ महिलाएं, बच्चे भी थे डिब्बे में जो अपनी ही दुनियां में मशरूफ और खोये-खोये थे।
आज कल के फैशन के अनुरूप हाथ मे सभी के मोबाइल भी शोभा बढ़ा रहा था।भई एक बात समझ नही आई कि जब जेब और पर्स होता है तो मोबाइल हाथ मे क्यूँ रखना ,पर क्या करें साहब दिखावे का जो जमाना है।
खैर हमें क्या ,हम तो कुछ समय के लिए ही यात्रा पर हैं।
सीट से बार-बार उठकर पान थूकने वाले,सिगरेट पीने वाले और मना करने पर भी न मानने वाले ,उफ़्फ़ ।ऊपर से सामान बेचने वाले अपनी ही धुन में मस्त ;किसी के पैर पर लात रखकर निकलते,किसी को जबरन समान खरीदने को कहते और कान के पास आकर चिल्लाते।
सच बहुत मुशिकल हो रहा था यात्रा करना पर मजबूरी थी।
ये मजबूरी उन तमाम लोगो की भी थी जो रोज की जद्दोजहद से झूझते और रेल यात्रा करते होंगें।
बीच-बीच में चढ़ने-उतरने वाले यात्री भी थे जो अपने गंतव्य पर उतर रहे थे।
एक महाशय तो जो बोलना शुरू हुए,तो भोपाल तक रुके ही नहीं ।
सर चकराने लगा कि कोई इतना स्टेमिना लेकर कोई कैसे यात्रा कर सकता है।
चलो जैसे -तैसे सफर कटा ,ठीक था ।कुछ जिंदगी के वास्तविक और सच्चे किरदार से रूबरू होने का मौका मिला।
यात्रा सामान्य रही।
-सपना परिहार
