अन्तरा शब्दशक्ति सृजक-सृजन समीक्षा

रविवारिय केंद्रीय रचनाकार विशेषांक

आज अन्तरा शब्दशक्ति के पटल पर आ. प्रणव राज,-कैमूर, बिहार का परिचय एवं उनकी पाँच रचनाएँ पाठकों की समीक्षा एवं विचारार्थ प्रस्तुत हैं।
सरल, सहज और भावप्रधान भाषा में लिखी गई इन रचनाओं में सम्भावनाएं , संस्कार, बदलते सामाजिक मूल्य, तकनीक का प्रभाव, रिश्तों की गरमाहट, प्रकृति, जीवन-दर्शन तथा नाबाई का सकारात्मक सोच का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है।
आप सभी सुधी पाठकों एवं साहित्यकारों से विनम्र अनुरोध है कि रचनाओं का गंभीरतापूर्वक अध्ययन कर अपनी निष्पक्ष, सारगर्भित एवं रचनात्मक समीक्षा अवश्य प्रदान करें। आपके सुझाव और मार्गदर्शन किसी भी रचनाकार के सृजन-पथ को नई दिशा और ऊर्जा प्रदान करते हैं।

प्रस्तुतकर्ता
डॉ. प्रीति समकित सुराना
संस्थापक एवं संपादक
अन्तरा शब्दशक्ति

सृजक सृजन समीक्षा

रचनाकार का परिचय

नाम : प्रणव राज
जन्मतिथि : 20/12/2009
माता-पिता : श्री राजीव कुमार तिवारी
श्रीमती स्मिता तिवारी
शिक्षा : मैट्रिकुलेशन, फिलहाल ग्यारहवीं में
लेखन-विधा : कविता, कहानी, ग़ज़ल, व्यंग
भाषाएं : हिंदी, अंग्रेजी एवं भाजपुरी

प्रकाशित कृतियां
देश भर की 30 से ज्यादा पत्र-पत्रिकाओं में कई रचनाओं का प्रकाशन

सम्मान
विभिन्न पत्रिकाओं से प्रदान सम्मान पत्र

मोबाइल : 7061181275
ई-मेल : smita.t1987@gmail.com

*रचनाकार का आत्मकथ्यर एवं परिचय

मेरा जन्म 20 दिसंबर 2009 को बिहार के रोहतास जिले के एक छोटे से शहर सासाराम में हुआ है। जो कि मेरा मामा गांव है। मेरे पिता का नाम श्री राजीव कुमार तिवारी एवं माता का नाम श्रीमती स्मिता कुमारी है। मेरे गांव का नाम अंधार है जो कि रोहतास में ही बसा है। मेरे पिता के व्यवसाय के कारण मेरा बचपन पटना के एक मोहल्ले में बीता और प्राथमिक शिक्षा पटना के ही भारत पब्लिक स्कूल में पूरी हुई। वहां करीब पांच छः साल रहने के बाद। मैं अपने माता पिता के साथ बिहार के औरंगाबाद चला गया। फिलहाल मैं कैमूर जिले के मोहनिया शहर में हूं। मोहनिया के ही डी. ए. वी पब्लिक स्कूल से मैने मैट्रिक की डिग्री हासिल की। मैं फिलहाल ग्यारहवीं में हूं और अपनी पढ़ाई के साथ साथ लेखन के कार्य से भी जुड़ा हूं। सातवीं कक्षा में मेरे अंदर लेखन के प्रति रुचि बड़ी और साहित्य को समझने का नया नजरिया भी प्राप्त हुआ। मैने अंग्रेजी के लेखक रसकिन बॉन्ड को अपना आदर्श माना और लिखना प्रारंभ किया। शुरुवात में मैने पच्चीस कहानियां लिखी जिसमें से एक कहानी केरला के एक बाल पत्रिका “द चिल्ड्रेन मैगजीन” में प्रकाशित हुई। उसके बाद अंग्रेजी के बड़े पत्रिकाओं में कविता प्रकाशित होने लगी। इसे के दौरान मेरा मनोबल बढ़ाने के लिए मेरे पुस्तकालय के अध्यक्ष “श्री जयदेव पाठक” जी ने काफी योगदान दिया और मेरी रुचि हिंदी साहित्य और काव्य रचनाओं के तरफ आकर्षित किया। मेरे अंग्रेजी के शिक्षकों ने भी मेरा बहुत सहयोग किया है। आज के समय में मेरी रचनाएं 30 से ज्यादा पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी है। जिसमें से हिंदी, अंग्रेजी और भोजपुरी की पत्रिकाएं हैं।
पत्रिकाओं की सूची:

  1. PCM The children’s magazine(English)
  2. CBT children’s world magazine(English)
  3. Kloud9 magazine(English)
  4. Bookosmia.Com
    (English)
  5. Ghudsavaar (hindi)
  6. Delhi University’s वाग्मिता पत्रिका
  7. Prabhat khabar hindi newspaper
  8. Nai goonj online magazine(hindi)
  9. Sahitynama (hindi)
  10. Sahity kunj (hindi)
  11. The children’s newspaper(English)
  12. Anubhuti(hindi)
  13. मिशन शिक्षण संवाद (Hindi)
  14. जयदीप पत्रिका (Hindi)
  15. हिंदी बोल इंडिया(Hindi)
  16. एकलव्यंम फाउंडेशन(Hindi)
  17. नवोदित प्रवाह(Hindi)
  18. इंदौर समाचार (Hindi कॉलम)
  19. बरोह पत्रिका(Hindi)
  20. Prizedale times(English)
  21. दैनिक निर्माण(Hindi)
  22. अमर उजाला काव्य(Hindi)
  23. देश रोजाना अखबार (Hindi)
  24. Magic pot Magazine (English)
  25. अंतरा शब्दशक्ति (Hindi)
  26. किलोल मासिक पत्रिका(Hindi)
  27. चहल पहल पत्रिका (Hindi)
  28. Robin age newspaper(English)
  29. Student Edge newspaper (English)
  30. दैनिक विनय उजाला अखबार (Hindi)
  31. अभिनव बालमन राष्ट्रीय पत्रिका (Hindi)
  32. मैना पत्रिका (भोजपुरी)
  33. टाबर टोली अखबार (हिंदी)
  34. दिया बाती पत्रिका (भोजपुरी)
  35. जग प्रेरणा दैनिक अखबार (हिंदी)

इस सूची को आगे बढ़ाने की मेरी कोशिश जारी है।

रचनाएं:

1 कुछ अच्छा नहीं
तुम्हे खो देना तकदीर के लिए अच्छा नहीं,
तुम्हे बस यादों में जिंदा रखना अच्छा नहीं।

हमारी कहानी अभी पूरी नहीं हुई है,
इसे अधूरा छोड़ देना अच्छा नहीं,

मुझे हमेशा समझाते हैं लोग,
तुम्हारी वापसी के लिए तरसना अच्छा नही,

मुझे गलत कभी मत समझना तुम,
इस नासमझ को गलत समझना अच्छा नहीं,

मैं हर रात अपने ही घर को जाता हूं,
अब तुम्हारी दहलीज पर माथा पटकना अच्छा नहीं,

बेपरवाह होकर प्रणव चला है उस ओर,
तुम्हारे साथ अब चलना अच्छा नहीं।

2 पापा को आराम चाहिए
सुबह तड़के से उठ जाते हैं,
नाश्ता भी नहीं खाते हैं,
दिन भर लैपटॉप पर खट खट करते-करते,
रात को थकान से टूट जाते हैं।

रविवार के दिन भी काम निपटाने में बच्चों के साथ नहीं खेलते हैं,
रात दिन सुबह शाम बॉस के नखरे झेलते हैं,
नींद न पूरी होती तो,
कुर्सी पर बैठे-बैठे झपकियां लेते हैं।

रोजमर्रा की कशमकश से दूर जाने का,
परिवार के संग बैठकर खाने का,
मन तो बहुत करता होगा उनका,
शारीरिक और मानसिक सुख पाने का।

माना, कि काम करने से पैसे आते हैं,
अगर पैसे कमाने में पापा अंदर से टूट जाते हैं,
तो लात मारो ऐसे पैसे को,
जिसके लिए पापा हमसे दूर जाते हैं।
पापा को थोड़ा आराम चाहिए,
दिन भर की भाग दौड़ से विश्राम चाहिए,
जीवन भर दौड़ते हैं वो,
उन्हें थोड़ा सा विराम चाहिए।

3 मौन हूं मैं भी
एकदम से,
खिड़की पे खट- खट हुई,
भाग के गया,
पल्ले खोले,
पर, वहां हवाओं के सिवा कुछ नहीं,
फिर दरवाजे पर आहट हुई,
दौड़ के गया,
दरवाजा खोला,
ओट से झांका पर कोई नहीं,
एक आस थी पहले,
तो दौड़ जाता था,
पर अब सब वहम के समान है,
और, अब न तो आहट होती है,
न ही दस्तक किसी की,
न तो कभी खट- खट सुनी मेरे कानों ने,
न ही दरवाजे के नीचे से खत के सरकने की आवाज़,
खिड़की और दरवाज़े की तरह,
मैं भी मौन हूं।

4 ग़ज़ल

पेट दिया है भगवान ने चाहिए कोई खिलाने वाला,
यादों से नफरत है मुझे चाहिए कोई मिटाने वाला।।
साथ चलने का वादा हुआ था हम दोनों का,
साथ तुमने छोड़ दिया चाहिए कोई निभाने वाला।
जो शिकायत होगी उसे सामने से कहेंगे,
जो पीठ पीछे तुमने कहा चाहिए कोई अनसुना कराने वाला।
एक दूसरे को जतन से रखेंगे बुरा न करेंगे कभी,
जो तुमने भी खंजर मारा चाहिए कोई दवा लगाने वाला।
लिखा है जो किस्मत में वही होता है सबके साथ,
मेरी किस्मत में बुरा लिखा है चाहिए कोई मिटाने वाला।
जीवन के अंधेरे में उजाला करना होगा मुझे,
माचिस है मेरे पास बस चाहिए कोई जलाने वाला।

5 इंसानों को देखा है
मैने जानवरों को ठंड से कांपते देखा है,
कुचल दिए जाते हैं सड़कों पर,
उन्हें रोते, बिलखते,आंसू बहाते देखा है,
उनके दुख को नजर अंदाज करके,
इंसानों को चैन से सोते देखा है,
जंगलों में आग लगते,
पेड़ों को कटते देखा है,
पर, भरपूर ऑक्सीजन लेकर,
इंसानों को सांस भरते देखा है,
रोड पर कचरा,
दीवारों पर थूकते देखा है,
“एक के सफाई करने से क्या होगा?” कहकर,
इंसानों को रास्ता नापते देखा है,
कईयों को डूबते देखा है, मदद करने के बजाय,
हैवानों को फोटो, वीडियो बनाते देखा है,
नर्क मैने कहीं देखा नहीं, पर, नर्क के शैतानों को रोड पर घूमते, टहलते देखा है।

-प्रणव राज
कैमूर (बिहार)

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