अन्तर्मन को पाती

अय मेरे मन,
तू तो जानता है कि बचपन से ही मेरे मन में एक तमन्ना थी कि मैं एक ऐसा गाँव बसाऊँ जिसमें सभी तरह की सुविधाएँ हों। सभी लोग पढ़े-लिखे, सुखी और साधन संपन्न हों। सौभाग्य से मुझे ऐसा परिवार मिला जो किसी छोटे-मोटे गाँव से कम नहीं था। माँ ने कहा कि तेरे मन में एक सुखी गाँव बसाने की बहुत तमन्ना थी। तेरी ससुराल भी किसी छोट-मोटे गाँव से कम नहीं है। 12 लोगों का परिवार … रहने के लिए केवल एक कमरा रसोई। रसोई जो शयन कक्ष भी… स्नानागार भी… और बैठक भी थी। शौचालय ऐसा जिसमें उस मकान के 30 लोग शौच के लिए जाते थे और वह भी पुराने स्टाइल में बना हुआ। एक बड़ा सा पत्थर… बीच में छेद… अपना तामलोट भी भरकर ले जाना पड़ता था। मायके में तीन स्नानागार, तीन शौचालय और तीन वाशबेसिन। मायके में हर तरह की सुविधा और ससुराल में सुविधाओं का बिल्कुल अभाव। पर मैंने स्वेच्छा से ही तो इस जीवन को स्वीकार किया था। एक सुखी गाँव बसाने का स्वप्न जो था। आज मैं बहुत खुश व संतुष्ट हूँ कि मेरा वह स्वप्न साकार हुआ।
हाँ! हाँ! मुझे क्यों बता रहा है कि मुझे अपमान के घूँट भी पीने पड़े। वो जिन्दगी में किसको नहीं पीने पड़ते? कुछ पाने के लिये कुछ खोना भी तो पड़ता है। लेकिन मैंने बदले में इतना पाया है कि वो झोली में भी नहीं समाता।
अब यह मत कहना कि दस वर्षों तक अपने या अपने बच्चों के लिये एक रुमाल तक नहीं खरीद पाई। घर की सबसे बड़ी बहू होने के नाते ननद देवरों का पालन-पोषण और उनका विवाह करना भी तो मेरी प्राथमिकता में शामिल था।बिना बाप के बच्चों के लिये मेरा भी तो कोई फ़र्ज़ बनता था। मुझे पता है कि मेरे तीनों बच्चों को एक वर्ष तक ही दूध नसीब हुआ। वो था ना ऊपर वाला। उसने ध्यान रखा। झूठ नहीं बोलूँगी। जब दिन में बीसों बार चाय बनती थी तब जरूर मन में विचार आता था कि सासू माँ अपने बच्चों से क्यों नहीं कहतीं कि इतनी चाय पीना ठीक नहीं है। बच्चों के लिये दूध रहने दो। पर वो भी ऊपरवाले की इच्छा पर छोड़ दिया कि वो खुद मेरा और बच्चों का ध्यान रखेगा। अपने या बच्चों के लिये कुछ नहीं खरीद पाई तो क्या हुआ।सिलाई कढ़ाई का हुनर था।ताऊ श्वसुर कपड़े की दुकान पर काम करते थे। वहाँ से थान में से बचे हुए कटपीस ले आते थे जिन्हें मैं अपने हुनर से खूबसूरत पोशाक बना लेती थी। जीवन की चुनौतियों को वरदान समझकर स्वीकार किया तभी तो आज पूरे ससुराल में दूर-दूर की रिश्तेदारी में सबकी चहेती हूँ। लोगों का तो मरने के बाद नाम होता है। मेरा तो जीते जी गुणगान हो रहा है। यह उपलब्धि क्या कम है?

-राधा गोयल
दिल्ली

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