मत मौन रहो, हुंकार भरो!
अपना अस्तित्व स्वीकार करो।
क्यूँ शिला तुम बनी रहो?
दोष नहीं जब तुम्हारा हो?
राह न तको अब किसी राम की,
रावण का प्रतिकार करो!
अपना अस्तित्व स्वीकार करो…
वस्तु नहीं हो जो लगो दांव पर,
ऐसे पति का बहिष्कार करो!
लाज बचाओ खुद अपनी,
कृष्ण का न इंतज़ार करो!
अपना अस्तित्व स्वीकार करो…
कोमल हो, कमजोर नहीं,
शिक्षा का औज़ार धरो।
सृष्टि का आधार तुम ही,
अब और न तुम तिरस्कार सहो!
अपना अस्तित्व स्वीकार करो…
”मृत्यु” भी तो नारी है,
सारी सृष्टि पर भारी है!
अस्तित्व अपना पहचानो,
मत मौन रहो, हुंकार भरो!
अपना अस्तित्व स्वीकार करो…
-कीर्ति प्रदीप वर्मा
