अपने लिए जिए तो क्या जिए

प्रकृति में लेना और देना साथ चलता है। हम सांस लेते हैं और वापस छोडते है। छोड़ी हुई सांस को पेड़ पौधे ग्रहण करते हैं। और वापस हमारी सांसों के लिए आक्सीजन छोड देते हैं।
जीव जगत इसी सिद्धांत पर चलता है।
इंसान पशुपालन करता है। बदले में दूध दही पनीर घी का व्यवसाय फलता फूलता है।
पर मानव ही एक मात्र ऐसा प्राणी है जो प्रकृति से जितना लेता है उतना वापस नहीं करता। या करना नहीं चाहता?
सवाल अपनी जगह है। पक्ष विपक्ष में बहस होती रहती है।
क्या सच में मानव स्वार्थी हैं।
हां सच यही है।
जमीन में से जल का दोहन,
जंगल के जंगल गायब कर दिये,
मांसाहार जिसमें मूक पशु को मारकर मांस भक्षण।
जाने कितनी प्रजाति विलुप्त हो गईं। कितनी विलुप्ती की कगार पर हैं।
क्षुद्र स्वार्थों में राजनीतिक युद्ध। जिसमें कितने विध्वंसकारी हथियारों का खुलेआम उपयोग हो रहा है। जिससे प्रकृति का संतुलन भी बिगड़ रहा है।
पावर और सत्ता का विद्रूप रूप मानवता के लिए खतरा है।
फिर भी दुनिया में ऐसे लोग भी है जिनका जीवन समाज हितार्थ समर्पित रहा।
मांझी जिन्होंने पहाड़ काट कर सड़क बना दी।
एक व्यक्ति ने अपने अकेले के दम पर की हेक्टर जमीन पर जंगल उगा दिए।
इन लोगों ने परोपकार को ही ध्येय बना लिया।
पर आम आदमी दोनों के बीच संतुलन बना कर जीवन जी सकता है।
सिर्फ अपने लिए जिए तो क्या जिए। अपने लिए भी जीना। और समाज का भी कुछ भला करना।🙏

-नमिता दुबे मिशा

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