ना माई अभी हमें पढ़ने दो। सरकार किताबें ड्रेस खाना सब देती है।हम पढ़ना चाहते हैं।
सातवीं कक्षा की छात्रा विभूति अपनी मां से बार बार विनती कर रही थी।
पर मां नलिनी अपने निर्णय से टस से मस नहीं हुई।
निर्धारित समय पर विभूति का विवाह उससे पच्चीस वर्ष बड़े लुम्बा के साथ कर दिया गया।
विभूति लुम्बा की तीसरी पत्नी बन उसके घर आ गई।
पहली पत्नी ने लुम्बा को छोड़कर किसी ओर के संग घर बसा लिया था। दूसरी पत्नी के दो बेटियां हैं। वंशवृद्धि के लिए बेटी की उम्र की विभूति को पैसा दे कर लुम्बा ने विवाह कर लिया।
तेरह वर्ष की अबोध बालिका विभूति अधेड़ की पत्नी बन सोलह वर्ष तक तीन बेटों की मां बन गई।
समय बीतता रहा। बच्चे बड़े होते गए और लुम्बा बूड़ा हो गया।
शराब पीकर अब वो उत्पात नहीं मचाता था बल्कि एक कोने में पड़ा रहता।
विभूति आस-पास की कालोनी के कुछ बड़े घरों में खाना और झाड़ू पोंछा लगाती थी।
तीनों बेटे पढ़ने में तेज थे।
मां की स्थिति और पिता का रवैया वे कम उम्र में ही समझ गये।
तीनों ही स्कालरशिप ले कर ऊंची-ऊंची उड़ानें भरने लगे।
एक इंजीनियर,एक वकील, एक बेटा डाक्टर बना और मां की मेहनत को सार्थक किया।
बेटों के कहने पर ही विभूति ने चुनाव लडा।
अपने व्यवहार संघर्ष और मददगार स्वभाव का नतीजा वो विधायक चुन ली गई।
जीत की खुशी, जीवन का संघर्ष सब मिलकर विभूति को अपराजिता बना रहे थे।
बहुत छोटा भाषण दिया उसने “हम बहुत छोटी उम्र में ब्याह दी गई थी। तरा-ऊपर तीन बेटा आ गये। पति घर में कुछ पैसा नहीं देता था। घरों में काम कर हम बेटन को पाले, पढाये। आत्मसम्मान के साथ जीवन बसर किये।आज हमारा संघर्ष मेहनत और हार ना मानना हमें यहां तक ले आया है।हम आप सबके लिए जो भी बन पड़ेगा जरूर करेंगे। बस आप सब हमारा साथ विश्वास के साथ देते रहिए।” धन्यवाद 🙏
पीछे एक कोने में अकेला बीमार खड़ा लुम्बा अपनी करनी का फल भोग रहा था।
कभी भी विभूति को प्यार सम्मान नहीं दिया। यहां तक की खाने का सामान भी वो घर नहीं लाता था।
विभूति कार में बैठ कर अपने बेटों के साथ सरकारी आवास में चली गई।
-नमिता दुबे मिशा
