मैं टूटा।
पर झुका नहीं।
इज्जत पर हमले हुए।
घर की दीवारों ने भी आवाज बदली।
रिश्तों ने हिसाब मांग लिया।
और जिसे अपना कहा था, वो रास्ता भी खुद बंद हो गया।
लोगों ने तय कर लिया – “ये अब खत्म है”।
मैंने तय कर लिया – “मैं अभी शुरू हूँ”।
मैं भीख नहीं मांगता।
मैं सफाई नहीं देता।
मैं पीछे मुड़कर नहीं देखता।
सुबह उठता हूँ।
माँ-बाप की दवा का समय मेरे हाथ में है।
भाई-बहन की जिम्मेदारी मेरी पीठ पर है।
और मेरा सर… वो कर्जदार नहीं है किसी का।
जेब खाली सही।
पर जुबान पर उधार के शब्द नहीं।
सेहत आधी सही।
पर हौसले में सेंध नहीं।
गिरा।
उठा।
धूल झाड़ी।
और फिर अपने रास्ते चल पड़ा।
तुम इसे संघर्ष कहते हो।
मैं इसे अनुशासन कहता हूँ।
दुनिया कहती है “अपराजिता नारी होती है”।
मैं कहता हूँ “अपराजिता वो आग है”
जो जलती है, पर राख नहीं बनती।
जो कटती है, पर कुंद नहीं होती।
मेरा नाम पूछोगे?
कागज पर “केवल”।
किरदार पर “अपराजिता”।
हारना मुझे आता नहीं।
और जो आता नहीं,
उसे मैं सीखता भी नहीं।
-आनंद पाण्डेय “केवल”
