अपराजिता

           गाँव के सबसे पुराने पीपल के नीचे एक छोटी-सी झोपड़ी थी। वहीं रहती थी अपराजिता — नाम की तरह ही कभी न हारने वाली। दस साल की उम्र में माँ-बाप को खो दिया, पर आँखों में पानी नहीं, चिंगारी थी।
   गाँव के लोग कहते, "बिटिया, शादी कर ले। अकेली कैसे काटेगी ज़िंदगी?" अपराजिता हँस देती। उसकी शादी तो किताबों से हुई थी। स्कूल तीन कोस दूर था। बरसात में कीचड़, जाड़े में कोहरा, पर अपराजिता की चप्पलें कभी रुकी नहीं। 
    एक दिन प्रधान का बेटा रास्ता रोककर खड़ा हो गया। "इतना पढ़कर क्या करेगी? चूल्हा-चौका ही करना है।" 

अपराजिता ने बस्ता संभाला और बोली, “चूल्हा भी जलाऊँगी भैया, पर पहले अपने गाँव का अँधेरा जलाऊँगी।”
दस साल बीत गए। वही अपराजिता लौटी, हाथ में डिग्री और आँखों में वही चिंगारी। पर इस बार अकेली नहीं थी। साथ लाई थी चार कंप्यूटर, दस सोलर लैंप और एक सपना।
पीपल के नीचे ही उसने पाठशाला खोली — “अपराजिता ई-पाठशाला”। जहाँ लड़कियाँ कोडिंग सीखतीं, औरतें बैंक चलाना सीखतीं, और प्रधान का वही बेटा अब बच्चों को गणित पढ़ाता।
पिछले सावन में जब बाढ़ आई, आधा गाँव डूब गया। सरकारी मदद पहुँचने में देर थी। अपराजिता ने अपनी ई-पाठशाला से ही ड्रोन उड़ाए, नक्शे बनाए, और व्हाट्सएप ग्रुप पर राहत पहुँचाई। तीन दिन में पूरा गाँव फिर खड़ा था।
कल कलेक्टर साहब आए थे। बोले, “अपराजिता जी, आपके गाँव को मॉडल विलेज घोषित करते हैं।”
अपराजिता ने पीपल की तरफ देखा और धीरे से कहा, “साहब, मॉडल मैं नहीं, मेरा गाँव है। मैं तो बस वो अपराजिता हूँ जो कभी हारी नहीं।”

आज भी पीपल के नीचे नीले फूल खिलते हैं— अपराजिता के फूल। गाँव के लोग कहते हैं, जब भी कोई बच्ची हार मानने लगती है, एक नीला फूल टूटकर उसकी किताब पर गिर जाता है।

-मंजू सरावगी मंजरी
रायपुर (छत्तीसगढ़)

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