सही सोच
मुनिया दौड़ते हुए घर आयी तो देखा कि घर तो बंद है।खुशी में वो यह भूल ही गई थी कि माई और काकी धान कूटने गए होंगें और बाबा, काका के साथ दुकान पर।छुटका खेल रहा होगा।वो कुछ देर पेड़ के नीचे बैठ गयी। गाय से बतियाने लगी। उसकी नज़र घर पर की गई मांई की चित्रकारी पर गई और वो सोचने लगी कि मैं भी माई से इसे जरूर सीखूंगीं। तभी उसे सब लोग आते दिखे। मुनिया ने तुरंत ही बताया कि वो पांचवीं में अच्छे अंक लेकर पास हो गई है। माई, बाबा, काका, काकी का खुशी का ठिकाना नहीं रहा क्योंकि गांव में मुनिया ही इतना आगे तक पढ़ रही है। कुछ देर बाद वे सभी लोग भी बधाई देने आए, जो माई बाबा के कान भरते थे कि “इसे मत पढ़ाओ, खर्चा कैसे उठाओगे। छुटका को भी तो पढ़ाना है,वो ज्यादा जरूरी है। आखिर वो ही तो बड़ा होकर सबको संभालेगा।” लेकिन माई बाबा ने मेहनत -मजदूरी करके मुनिया को पढ़ने में मदद करते रहे।उसका परिणाम सामने था।माई बाबा ने दूसरे दिन सभी गांव को न्यौता दिया,मिठाई बांटीं और खूब बाजे बजवाए।
-डॉ अमृता शुक्ला
