कोई बताए हमें उनको अब गिला क्या है,
रफ़ीक़ हैं वो अगर फिर ये मसअला क्या है,
गुज़िश्ता रात को इक शम्मा बुझ गई यारो,
धुंआं उठा ही नहीं,बज़्म में जला क्या है,
ये दिल ने दावा किया है के हम न टूटेंगे,
ये ना मुराद ही कहता है ये ख़ला क्या है,
जो ठोकरों में कभी ख़ाक बन के रहते थे,
जुनून-ए -इश्क़ को कहते हैं ये बला क्या है,
फ़ज़ां में शोर पतंगों का ख़ूब बरपा रहा,
कोई न आया गया,फिर ये सिलसिला क्या है,
न कोई साग़र-ओ-मीना न कोई साक़ी है,
अजब ख़ुमार है महफ़िल में फिर चला क्या है।
-उर्मिला माधव
