अब बागो में नहीं मस्ती वे

मौन गगन है
मौन पताका,
मौन दिखी धरती वे।

थल ही थल में
जन ही जन
उड़ गए बचे परती वे।

बढ़ रही आबादी
पूरी न होती खेत में खादी
हाथ मोबाइल दर सस्ती वे।

खेल खिलौने कम होते
हाय रुपया चक्कर में कम सोते
अब बागों में नही मस्ती वे।

-उमाकांत यादव उमंग

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